अंधे हैं वो लोग जो भगवान को ढूँढते हैं, मैं तो उन्हें रोज़ देखता हूँ!
साक्षात ईश्वर: वे पाँच शक्तियाँ जिन्हें हम प्रतिदिन देखते हैं
अक्सर हम ईश्वर की खोज में अपनी आँखें बंद कर लेते हैं और मंदिरों की दीवारों में उन्हें तलाशते हैं। किंतु क्या हमने कभी अपनी आँखें खोलकर अपने परिवेश को देखा है? मेरा यह मानना है कि इस सृष्टि में पाँच ऐसे देवता हैं जिन्हें हम साक्षात देख सकते हैं। यह कोई कल्पना नहीं, जिसे हम इस पृथवी पर देख सकते है,जिसे हम महसूस भी कर सकते हैं, बल्कि वह परम सत्य है जिसके बिना मानव जीवन का अस्तित्व एक क्षण भी संभव नहीं है।
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१. पवन (वायु) — प्राण शक्ति
हम भोजन के बिना कई दिन जीवित रह सकते हैं, परंतु वायु के बिना कुछ मिनट भी नहीं। यह वह अदृश्य ईश्वर है जो हमारे फेफड़ों में 'प्राण' बनकर दौड़ता है। वायु ही जीवन का आधार है; क्या इससे बड़ा कोई और देवता हो सकता है जो हमें प्रतिपल जीवित रखता है?
२. धरती (पृथ्वी) — जननी और आधार
यह धरा हमारा निश्चल आधार है। हम इस पर निवास करते हैं, इसी की छाती चीरकर अन्न उपजाते हैं, और यह एक माँ की भांति हमारा समस्त बोझ सहन करती है। हमारा अस्तित्व इसी मिट्टी से प्रारंभ होता है और अंत में इसी मिट्टी में विलीन हो जाना है।
३. सूर्य (प्रकाश) — ब्रह्मांड की आत्मा
सूर्य केवल एक तारा नहीं, बल्कि इस चराचर जगत की आत्मा है। यदि सूर्य का उदय न हो, तो समस्त सृष्टि शीत और अंधकार में समा जाएगी। बिना किसी भेदभाव के सबको प्रकाश और ऊर्जा देने वाला सूर्य ही वह 'प्रत्यक्ष देव' है जिसे हम अपनी आँखों से देख सकते हैं।
४. पानी (जल) — जीवन की अमृत धारा
कहा गया है कि "जल ही जीवन है"। हमारा शरीर स्वयं सत्तर प्रतिशत जल से निर्मित है। नदियों और सागरों के रूप में प्रवाहित यह तत्व न केवल हमारी प्यास बुझाता है, बल्कि समस्त प्रकृति का अभिषेक करता है। जल के बिना यह संसार केवल एक मरुस्थल बनकर रह जाएगा।
५. अनाज (अन्न) — पोषण का साक्षात रूप
मनुष्य चाहे जितना भी धन संचय कर ले, वह स्वर्ण का ग्रास नहीं ले सकता। उदर की जठराग्नि को शांत करने के लिए मिट्टी से उपजा वह एक दाना ही काम आता है। अन्न ही हमारे शरीर को बल और बुद्धि प्रदान करता है। इसीलिए 'अन्नं ब्रह्म' कहा गया है, क्योंकि यही हमारा पालन-पोषण करता है।
निष्कर्ष:
आज की पीढ़ी भले ही इसे 'पर्यावरण' या 'नेचर' कहे, किंतु यदि हम इन पाँच तत्वों को केवल 'संसाधन' मानने के बजाय 'ईश्वर' के रूप में पूजने लगें, तो हम कभी इनका अपमान या दोहन नहीं करेंगे। इन पाँचों की सुरक्षा और सम्मान करना ही वास्तविक उपासना है। मंदिर के देवता हमारे भाव सुनते हैं, परन्तु असली भगवान ये है जिनके बिना जीवन असंभव है ये पाँच देवता हमें हर क्षण जीवन प्रदान करते हैं।
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