पहाड़ों की गूंज: आशा की कहानी (Pashadon Ki Goonj: Aasha Ki Kahani)

 


हिमालय की तलहटी में बसा छोटा सा गाँव शान्ति का पर्याय था। वहाँ रहने वाली मीरा, एक हंसमुख और मेहनती लड़की थी। पढ़ाई में तेज और सपनों से भरी, मीरा डॉक्टर बनना चाहती थी। गाँव के सरकारी स्कूल में पढ़ाई कर पाना ही उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि थी, लेकिन आगे का रास्ता कठिन था।



मीरा के पिता, एक गरीब किसान थे। उनका सारा जीवन खेतों में बीतता था, ताकि परिवार का पेट भरा रहे। मीरा की माँ, घर की देखभाल के साथ खेतों में भी पिता का हाथ बंटाती थीं। डॉक्टरी की पढ़ाई के लिए शहर जाना और उसका खर्च वहन करना उनके बस की बात नहीं थी।

एक शाम, खेत से लौटते हुए मीरा के पिता ने उसे उदास देखा। उन्होंने मीरा से पूछा, "बेटी, क्या बात है? इतनी उदास क्यों हो?"



आँखों में आंसू लिए मीरा ने कहा, "पिताजी, मैं डॉक्टर बनना चाहती हूँ, पर शहर जाकर पढ़ने के लिए पैसा कहाँ से लाएंगे?"

पिताजी ने उसे प्यार से गले लगाते हुए कहा, "बेटी, सपने तो हर किसी को देखने का हक है। कोशिश करने में क्या हर्ज है?"



उसी रात, मीरा ने देर रात तक जागकर शहर के मेडिकल कॉलेजों के बारे में जानकारी जुटाई। उसने पाया कि कुछ कॉलेज मेधावी छात्रों को छात्रवृत्ति देते हैं। अगले दिन, उसने स्कूल के प्रिंसिपल से बात की। प्रिंसिपल, मीरा की लगन और मेहनत से वाकिफ थे। उन्होंने मीरा को आगामी छात्रवृत्ति परीक्षा के लिए तैयार करने में मदद की।

मीरा ने दिन-रात एक कर पढ़ाई की। गाँव के माहौल से हटकर पढ़ाई करना उसके लिए चुनौती थी, लेकिन उसने हार नहीं मानी। आखिरकार, परीक्षा का दिन आया। मीरा ने पूरे आत्मविश्वास के साथ परीक्षा दी।



कुछ हफ्तों बाद, मीरा को कॉलेज से एक पत्र मिला। वह खुशी से झूम उठी। पत्र में लिखा था कि उसे छात्रवृत्ति मिल गई है! मीरा अपने सपने के एक कदम और करीब थी।

विदाई के समय पूरा गाँव इकट्ठा हो गया था। मीरा की आँखों में खुशी के साथ-साथ गाँव छोड़ने का गम भी झलक रहा था। गाँव के बुजुर्गों ने उसे आशीर्वाद दिया। माँ ने स्नेह से उसका थैला संभाला और पिताजी ने आखों में छलके आँसू छिपाते हुए कहा, "बेटी, पढ़-लिखकर नाम रोशन करना। गाँव की बेटी डॉक्टर बनकर लौटना।"



शहर की चकाचौंध भरी जिंदगी मीरा के लिए बिल्कुल नई थी। कॉलेज में पढ़ाई के साथ-साथ छात्रवृत्ति के नियमों के अनुसार उसे अस्पताल में भी काम करना पड़ता था। थकान होती थी, पर मीरा पीछे मुड़कर नहीं देखती थी। वह अपने सपने को पूरा करने के लिए दृढ़ थी।

कॉलेज में कई उतार-चढ़ाव आए। एक बार, मीरा की पढ़ाई छूटने का खतरा भी मंडराया। कॉलेज फीस में अचानक वृद्धि हुई, जिससे उसकी छात्रवृत्ति अपर्याप्त हो गई। मीरा ने हार न मानते हुए कॉलेज प्रशासन से बात की। उसने उन्हें अपनी आर्थिक स्थिति बताई और मदद की गुहार लगाई। कॉलेज प्रशासन, मीरा की मेहनत और लगन से प्रभावित हुआ और उन्होंने फीस में रियायत दे दी।



छह साल बाद, मीरा एक योग्य डॉक्टर बनकर गाँव लौटी। गाँववालों ने उसका भव्य स्वागत किया।

वहाँ एक छोटा-सा क्लीनिक खोला। गाँव में डॉक्टर न होने की समस्या दूर हो गई। मीरा गरीबों का निःशुल्क इलाज करती थीं। गाँववालों के लिए वह सिर्फ एक डॉक्टर नहीं, बल्कि उम्मीद की किरण बन गई थीं।



एक दिन, गाँव में रहने वाले छोटे से बच्चे, राहुल को तेज़ बुखार आया। उसके माता-पिता, गरीब मजदूर थे। उनके पास शहर के बड़े अस्पताल ले जाने के लिए पैसे नहीं थे। रात के अंधेरे में वे घबराए हुए मीरा के क्लीनिक पहुंचे।

मीरा ने राहुल की जांच की और पाया कि उसे डेंगू हो गया है। गाँव के अस्पताल में ऐसी बीमारी का इलाज संभव नहीं था। मीरा जानती थीं कि राहुल को तुरंत शहर के बड़े अस्पताल ले जाना ज़रूरी है।



बिना समय गँवाए मीरा ने खुद गाड़ी निकाली और राहुल को अपने साथ अस्पताल ले गईं। रास्ते में राहुल की हालत बिगड़ने लगी। मीरा गाड़ी की रफ्तार बढ़ाती रहीं और रात भर राहुल का इलाज कराती रहीं।

कुछ दिनों के इलाज के बाद राहुल स्वस्थ हो गया। राहुल के माता-पिता मीरा के आभारी थे। उनके पास डॉक्टर की फीस देने के लिए पैसे नहीं थे, लेकिन मीरा ने एक पैसे भी नहीं लिया।



यह सिर्फ एक उदाहरण था। मीरा ने ऐसे अनगिनत गरीब मरीजों का इलाज किया। गाँववालों के बीच मीरा की इज्जत और बढ़ गई।

एक शाम, मीरा क्लीनिक के बाहर बैठी थीं, तभी दूर से आती हुई बच्चों की आवाज सुनाई दी। कुछ बच्चे किताबें लिए गाते हुए आ रहे थे। वे गाँव में ही बने एक छोटे से स्कूल के छात्र थे। वे स्कूल के बाहर खड़े होकर एक गाना गा रहे थे:



“पहाड़ों की गूंज है, आशा की कहानी है,

मीरा डॉक्टर बनी है, हम सबकी रानी है।”



मीरा की आँखें भर आईं। गाँव के बच्चों का यह प्यार ही उसकी असली कमाई थी। उन्हें शिक्षित और स्वस्थ देखना ही उसका असली सपना था। मीरा ने मन ही मन ठानी कि वह गाँव में शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधाओं को और बेहतर बनाने के लिए काम करेगी।

मीरा की कहानी गाँव के हर बच्चे के लिए प्रेरणा बन गई। उनकी कहानी पहाड़ों की गूंज सी बन गई, जो हर किसी को यह सिखाती है कि अगर मन में जुनून हो और मेहनत करने की लगन हो, तो सपने ज़रूर पूरे होते हैं। मीरा की कहानी यह भी बताती है कि सफलता सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि दूसरों के लिए भी काम आनी चाहिए।





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